अथर्ववेद (कांड 6)
य इ॒मां दे॒वो मेख॑लामाब॒बन्ध॒ यः सं॑न॒नाह॒ य उ॑ नो यु॒योज॑ । यस्य॑ दे॒वस्य॑ प्र॒शिषा॒ चरा॑मः॒ स पा॒रमि॑च्छा॒त्स उ॑ नो॒ वि मु॑ञ्चात् ॥ (१)
शत्रुओं को मारने में कुशल देव ने अपने शत्रु को मारने के लिए यह मेखला बांधी है, जो इस समय भी दूसरों की मेखला को बांधता है, जिस ने मेखला के द्वारा हमें अभिचार कर्म में लगाया है तथा जिस देव की आज्ञा से हम चलतेफिरते हैं, वह हमारे द्वारा प्रारंभ किए गए अभिचार की समाप्ति की इच्छा करे. वही हमें शत्रुओं से छुड़ाए. (१)
The God, who is skilled in killing the enemies, has tied this belt to kill his enemy, which binds the belt of others even at this time, who has engaged us in abhichar karma through the mekhala and the god by whose command we walk, he wishes to end the abhichar started by us. May he free us from our enemies. (1)