हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 6.133.3

कांड 6 → सूक्त 133 → मंत्र 3 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 133
मृ॒त्योर॒हं ब्र॑ह्मचा॒री यदस्मि॑ नि॒र्याच॑न्भू॒तात्पुरु॑षं य॒माय॑ । तम॒हं ब्रह्म॑णा॒ तप॑सा॒ श्रमे॑णा॒नयै॑नं॒ मेख॑लया सिनामि ॥ (३)
मैं ब्रह्मचारी होने के कारण सूर्य के पुत्र यमराज का सेवक हूं. इसी कारण मैं प्राणियों में से अपने शत्रु के विनाश हेतु यमराज से प्रार्थना करता हूं. मारने योग्य उस शत्रु को मैं मंत्र, तप, शारीरिक दंड एवं मेखला के द्वारा बांधता हूं. (३)
Being a celibate, I am a servant of Yamraj, the son of the Sun. That is why I pray to Yamraj for the destruction of my enemy from among the creatures. I bind that enemy worthy of killing with mantra, penance, physical punishment and mekhala. (3)