हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 135
यद॒श्नामि॒ बलं॑ कुर्व इ॒त्थं वज्र॒मा द॑दे । स्क॒न्धान॒मुष्य॑ शा॒तय॑न्वृ॒त्रस्ये॑व॒ शची॒पतिः॑ ॥ (१)
मैं जो भोजन करता हूं, उस से मुझे बल प्राप्त होता है. उस बल से मैं वज्र पकड़ता हूं. हे वज्र! इंद्र ने जिस प्रकार राक्षस के शरीर के अवयवों को काट डाला था, उसी प्रकार तू मेरे शत्रु के शरीर को काट डाल. (१)
I get strength from the food I eat. With that force, I hold the thunderbolt. O thunderbolt! Just as Indra cut off the body parts of the demon, you cut off the body of my enemy. (1)

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 135
यत्पिबा॑मि॒ सं पि॑बामि समु॒द्र इ॑व संपि॒बः । प्रा॒णान॒मुष्य॑ सं॒पाय॒ सं पि॑बामो अ॒मुं व॒यम् ॥ (२)
मैं जो जल पीता हूं, उस के द्वारा मानव शत्रु को पकड़ कर उस का रस पीता हूं. जिस प्रकार सागर नदी मुख से पूरा जल ग्रहण कर के पी जाता है, उसी प्रकार मैं श्रु का रस पीता हूं. मैं पहले इस शत्रु के प्राणों को रस बना कर पीता हूं और बाद में इस पूरे शत्रु का विनाश कर देता हूं. (२)
Through the water I drink, I catch the human enemy and drink its juice. Just as the ocean takes all the water from the river mouth and drinks it, in the same way I drink the juice of shrew. I first drink the life of this enemy by making juice and later destroying this whole enemy. (2)

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 135
यद्गिरा॑मि॒ सं गिरा॑मि समु॒द्र इ॑व संगि॒रः । प्रा॒णान॒मुष्य॑ सं॒गीर्य॒ सं गि॑रामो अ॒मुं व॒यम् ॥ (३)
मैं जो कुछ निगलता हूं, उस के द्वारा अपने मानव शत्रु को ही निगल जाता हूं. जिस प्रकार सागर नदी के जल को निगल जाता है, उसी प्रकार मैं शत्रु के अंगों को निगलता हूं. मैं पहले इस शत्रु के अंगों को निगलता हूं और बाद में इसे समाप्त कर देता हूं. (३)
I swallow my human enemy through what I swallow. Just as the ocean swallows the water of the river, so I swallow the enemy's limbs. I first swallow the organs of this enemy and later end it. (3)