अथर्ववेद (कांड 6)
यद्गिरा॑मि॒ सं गिरा॑मि समु॒द्र इ॑व संगि॒रः । प्रा॒णान॒मुष्य॑ सं॒गीर्य॒ सं गि॑रामो अ॒मुं व॒यम् ॥ (३)
मैं जो कुछ निगलता हूं, उस के द्वारा अपने मानव शत्रु को ही निगल जाता हूं. जिस प्रकार सागर नदी के जल को निगल जाता है, उसी प्रकार मैं शत्रु के अंगों को निगलता हूं. मैं पहले इस शत्रु के अंगों को निगलता हूं और बाद में इसे समाप्त कर देता हूं. (३)
I swallow my human enemy through what I swallow. Just as the ocean swallows the water of the river, so I swallow the enemy's limbs. I first swallow the organs of this enemy and later end it. (3)