हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 6.138.4

कांड 6 → सूक्त 138 → मंत्र 4 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 138
ये ते॑ ना॒ड्यौ दे॒वकृ॑ते॒ ययो॒स्तिष्ठ॑ति॒ वृष्ण्य॑म् । ते ते॑ भिनद्मि॒ शम्य॑या॒मुष्या॒ अधि॑ मु॒ष्कयोः॑ ॥ (४)
हे कामिनी! जिस प्रकार जल न पीने वालों का मुंह सूख जाता है, उसी प्रकार तू मेरे प्रति काम भावना से संतप्त हो. तू सूखे मुंह वाली बन कर मेरे समीप आ. (४)
O Kamini! Just as the mouths of those who do not drink water dry up, so you are satisfied with the feeling of work towards Me. Come near to me as a dry-mouthed one.