अथर्ववेद (कांड 6)
न्य॑स्ति॒का रु॑रोहिथ सुभगं॒कर॑णी॒ मम॑। श॒तं तव॑ प्रता॒नास्त्रय॑स्त्रिंशन्निता॒नाः। तया॑ सहस्रप॒र्ण्या हृद॑यं शोषयामि ते ॥ (१)
हे शंखपुष्पी! तू दुर्भाग्य के लक्षण को पूरी तरह निगलती हुई उत्पन्न होती है. तू मेरे सौभाग्य का निर्माण करती है. हे जड़ीबूटी! तेरी सौ शाखाएं तथा तैंतीस जड़े हैं. हे नारी! इस हजार पत्तों वाली शंखपुष्पी के द्वारा मैं तेरे हृदय को कामाग्नि से संतप्त करता हूं. (१)
Hey Shankhpushpi! You are born swallowing the signs of misfortune whole. You make my fortune. Hey herb! You have one hundred branches and thirty three roots. O woman! Through this thousand-petalled conch shell, I satiate your heart with the fire of desire. (1)