हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 24
हि॒मव॑तः॒ प्र स्र॑वन्ति॒ सिन्धौ॑ समह सङ्ग॒मः । आपो॑ ह॒ मह्यं॒ तद्दे॒वीर्दद॑न्हृ॒द्द्योत॑भेष॒जम् ॥ (१)
पाप नाशक गंगा आदि नदियों का जल हिमालय से निकलता है और सागर में मिलता है. इस प्रकार का दिव्य जल हृदय की जलन मिटाने वाली ओषथियां प्रदान करे. (१)
The water of the sin-destroying Rivers like Ganga etc. comes out of the Himalayas and meets the ocean. May this type of divine water provide medicines that remove heartburn. (1)

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 24
यन्मे॑ अ॒क्ष्योरा॑दि॒द्योत॒ पार्ष्ण्योः॒ प्रप॑दोश्च॒ यत् । आप॒स्तत्सर्वं॒ निष्क॑रन्भि॒षजां॒ सुभि॑षक्तमाः ॥ (२)
जो रोग मेरी आंखों को व्यथित करते हैं, जो मेरे घुटनों और जांघों में आश्रय लेते हैं, व्याधि विनाशकों में कुशल दिव्य जल उन सब को नष्ट करें. (२)
May the divine water skilled in the evil destroyers that disturb my eyes, which take shelter in my knees and thighs. (2)

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 24
सि॑न्धुपत्नीः॒ सिन्धु॑राज्ञीः॒ सर्वा॒ या न॒द्य स्थन॑ । द॒त्त न॒स्तस्य॑ भेष॒जं तेना॑ वो भुनजामहै ॥ (३)
हे जलो! सागर तुम्हारा पति है और तुम सागर रूपी राजा की पत्नियां हो. तुम सब नदी रूप हो जाओ. तुम सब मुझे उस रोग को दूर करने की ओषधि दो, जिस से में निरोग हो सकूं. (३)
O burn! Sagar is your husband and you are the wives of the king of the ocean. You all become the river form. All of you give me the help to remove that disease, so that I can be healthy. (3)