हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 6.25.2

कांड 6 → सूक्त 25 → मंत्र 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 25
स॒प्त च॒ याः स॑प्त॒तिश्च॑ सं॒यन्ति॒ ग्रैव्या॑ अ॒भि । इ॒तस्ताः सर्वा॑ नश्यन्तु वा॒का अ॑प॒चिता॑मिव ॥ (२)
गरदन की नसों में स्थित सतहत्तर प्रकार की गंडमालाएं गरदन की धमनियों को व्याप्त करती हैं. वे सब इस प्रकार नष्ट हो जाएं, जिस प्रकार पतिव्रता को पा कर सभी दोष नष्ट हो जाते हैं. (२)
The seventy-surface ganglions located in the veins of the neck pervade the arteries of the neck. All of them should be destroyed in such a way that all the defects are destroyed by getting pativrata. (2)