अथर्ववेद (कांड 6)
यौ ते॑ दू॒तौ नि॑रृत इ॒दमे॒तोऽप्र॑हितौ॒ प्रहि॑तौ वा गृ॒हं नः॑ । क॑पोतोलू॒काभ्या॒मप॑दं॒ तद॑स्तु ॥ (२)
हे पाप देवता निर्ऋति! तेरे द्वारा भेजे हुए जो कबूतर और उल्लू हैं. वे मेरे घर में आ कर भी आश्रय न पा सकें. (२)
O sin god Nirti! The pigeons and owls sent by you. They could not come to my house and get shelter. (2)