अथर्ववेद (कांड 6)
स विश्वा॒ प्रति॑ चाक्लृप ऋ॒तूंरुत्सृ॑जते व॒शी । य॒ज्ञस्य॒ वय॑ उत्ति॒रन् ॥ (२)
वैश्वानर अग्नि सभी प्रजाओं को सभी फल देने में समर्थ हैं. स्वतंत्र अग्नि सूर्य के रूप में वसंत आदि ऋतुओं का निर्माण करते हैं. वे यज्ञ का अन्न देवों को प्राप्त कराते हैं. (२)
Vaishvanar Agni is capable of giving all fruits to all subjects. Independent agnis form spring seasons in the form of sun. They get the food of yajna to the gods. (2)