अथर्ववेद (कांड 6)
अ॒ग्निः परे॑षु॒ धाम॑सु॒ कामो॑ भू॒तस्य॒ भव्य॑स्य । स॒म्राडेको॒ वि रा॑जति ॥ (३)
उत्तम स्थानों में अग्नि सम्राट्, भूत और भविष्यत काल में कामनापूर्ण करने वाला हो कर विराजता है. (३)
In the best places, the agni emperor sits in the past and the future as a wisher. (3)