हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 42
अव॒ ज्यामि॑व॒ धन्व॑नो म॒न्युं त॑नोमि ते हृ॒दः । यथा॒ संम॑नसौ भू॒त्वा सखा॑याविव॒ सचा॑वहै ॥ (१)
हे पुरुष! धनुर्धारी जिस प्रकार धनुष पर चढ़ी हुई डोरी को उतारता है, उसी प्रकार मैं तेरे हृदय से क्रोध को दूर करता हूं. (१)
O man! Just as the archer takes off the string mounted on the bow, so I remove anger from your heart. (1)

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 42
सखा॑याविव सचावहा॒ अव॑ म॒न्युं त॑नोमि ते । अ॒धस्ते॒ अश्म॑नो म॒न्युमुपा॑स्यामसि॒ यो गु॒रुः ॥ (२)
मित्रों के समान हम एकमत हो कर रक्षा कार्य करें. हे क्रुद्ध पुरुष! मैं तेरे क्रोध को भारी पत्थर के नीचे दबाता हूं. (२)
Like friends, we should do defense work unanimously. O angry man! I press your anger under a heavy stone. (2)

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 42
अ॒भि ति॑ष्ठामि ते म॒न्युं पार्ष्ण्या॒ प्रप॑देन च । यथा॑व॒शो न वादि॑षो॒ मम॑ चित्तमु॒पाय॑सि ॥ (३)
हे वृद्ध पुरुष! मैं तेरे क्रोध को अपने अधीन करने के लिए पैरों के ऊपर और नीचे के भागों से खड़ा होता हूं. जिस प्रकार तुम परवश हो कर मेरा विरोध करने में समर्थ न बनो तथा जिस प्रकार तुम मेरे मन के अनुकूल बनो, मैं वैसा ही उपाय करता हूं. (३)
O old man! I stand from the top and bottom of my feet to subjugate your anger. Just as you should not be able to resist Me by being in control and the way you adapt to My mind, I take the same remedy. (3)