अथर्ववेद (कांड 6)
अव॒ ज्यामि॑व॒ धन्व॑नो म॒न्युं त॑नोमि ते हृ॒दः । यथा॒ संम॑नसौ भू॒त्वा सखा॑याविव॒ सचा॑वहै ॥ (१)
हे पुरुष! धनुर्धारी जिस प्रकार धनुष पर चढ़ी हुई डोरी को उतारता है, उसी प्रकार मैं तेरे हृदय से क्रोध को दूर करता हूं. (१)
O man! Just as the archer takes off the string mounted on the bow, so I remove anger from your heart. (1)