हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 6.44.3

कांड 6 → सूक्त 44 → मंत्र 3 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 44
रु॒द्रस्य॒ मूत्र॑मस्य॒मृत॑स्य॒ नाभिः॑ । वि॑षाण॒का नाम॒ वा अ॑सि पितॄ॒णां मूला॒दुत्थि॑ता वातीकृत॒नाश॑नी ॥ (३)
हे गाय के सींग से निकले हुए जल! तू रुद्र का मूत्र तथा अमृत का बंधक है. हे गाय के सींग! तू विषाण नाम के रोग को शांति की सूचना देता है. तू पितरों के मूल से उत्पन्न तथा रक्तस्राव के आधार पाप का नाश करने वाला है. (३)
O water coming out of the cow's horn! You are the hostage of Rudra's urine and nectar. O cow's horn! You give peace to a disease called Poison. You are the destroyer of sin born from the root of the ancestors and the basis of bleeding. (3)