हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 63
यत्ते॑ दे॒वी निरृ॑तिराब॒बन्ध॒ दाम॑ ग्री॒वास्व॑विमो॒क्यं यत् । तत्ते॒ वि ष्या॒म्यायु॑षे॒ वर्च॑से॒ बला॑यादोम॒दमन्न॑मद्धि॒ प्रसू॑तः ॥ (१)
हे पुरुष! अनिष्टकारिणी देवी ने तेरे सभी अंगों में पाप रूपी फंदा डाला है और तेरी गरदन में ऐसी रस्सी बांधी है, जिस से छूटना असंभव है. मैं उस निर्त्ति रूपी फंदे से तुझे चिर काल तक जीवित रहने के लिए, बल के लिए एवं तेज के लिए छुड़ाता हूं. मेरे द्वारा छुड़ाया हुआ तू मेरी प्रेरणा से सदा अन्न का भक्षण कर. (१)
O man! The evil goddess has put a sin trap in all your organs and tied such a rope in your neck, from which it is impossible to get rid of it. I redeem you from that bondage for everlasting, for strength and for glory. You redeemed by me, always eat food with my inspiration. (1)

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 63
नमो॑ऽस्तु ते निरृते तिग्मतेजोऽय॒स्मया॒न्वि चृ॑ता बन्धपा॒शान् । य॒मो मह्यं॒ पुन॒रित्त्वां द॑दाति॒ तस्मै॑ य॒माय॒ नमो॑ अस्तु मृ॒त्यवे॑ ॥ (२)
हे तीक्ष्ण दीप्ति वाली एवं अनिष्टकारिणी देवी निर्त्ति! तुझे नमस्कार है. नमस्कार से प्रसन्न हो कर तू लोहे के बने बंधन के फंदों से हमें छुड़ा. हे साधक पुरुष! पाप से मुक्त होने पर यम ने तुम्हें इसी लोक को दे दिया है. मृत्यु के देव उन यम को नमस्कार है. (२)
This bright and evil goddess is the creator! Hello to you. Pleased with namaskar, you rescued us from the noose of iron. O man of seekers! On being free from sin, Yama has given you this world. Salutations to Yama, the god of death. (2)

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 63
अ॑य॒स्मये॑ द्रुप॒दे बे॑धिष इ॒हाभिहि॑तो मृ॒त्युभि॒र्ये स॒हस्र॑म् । य॒मेन॒ त्वं पि॒तृभिः॑ संविदा॒न उ॑त्त॒मं नाक॒मधि॑ रोहये॒मम् ॥ (३)
हे निर्ऋृति! लोहे की शृंखलाओं में अथवा लकड़ी के बने चरण बंधन में जब तुम किसी पुरुष को बांधती हो, तब वह इस लोक में मृत्यु के द्वारा बंधा हो जाता है. प्रसिद्ध ज्वर आदि रोग और राक्षस, पिशाच आदि मृत्यु के हजारों कारण हैं. हे निर्त्ति! तुम मृत्यु देव यम से और देवता, पितर आदि से तालमेल कर के इस पुरुष को उत्तम सुख प्रदान करो. (३)
O nirrriti! When you tie a man in iron chains or in a wooden step bond, he is bound by death in this world. There are thousands of causes of death like famous fever etc. diseases and demons, vampires etc. O creation! You should give good happiness to this man by coordinating with death god Yama and with gods, ancestors etc. (3)

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 63
संस॒मिद्यु॑वसे वृष॒न्नग्ने॒ विश्वा॑न्य॒र्य आ । इ॒डस्प॒दे समि॑ध्यसे॒ स नो॒ वसू॒न्या भ॑र ॥ (४)
हे अभिलाषाएं पूर्ण करने वाले अग्नि देव! तुम समस्त प्रकार के धन प्राप्त कराते हो. तुम यज्ञवेदी में प्रज्वलित होते हो. तुम हमें धन दो. (४)
O God of agni who fulfills desires! You get all kinds of money. You are ignited in the yagyavedi. You give us money. (4)