अथर्ववेद (कांड 6)
यथा॑ मां॒सं यथा॒ सुरा॒ यथा॒क्षा अ॑धि॒देव॑ने । यथा॑ पुं॒सो वृ॑षण्य॒त स्त्रि॒यां नि॑ह॒न्यते॒ मनः॑ । ए॒वा ते॑ अघ्न्ये॒ मनोऽधि॑ व॒त्से नि ह॑न्यताम् ॥ (१)
मांसभक्षी को मांस, शराबी को शराब और जुआरी को पासे जिस प्रकार प्रिय होते हैं तथा जिस प्रकार सुरत चाहने वाले पुरुष का मन स्त्री में लगा रहता है, हे गौ! उसी प्रकार तेरा मन तेरे बछड़े में लगा रहे. (१)
The way meat is dear to the carnivore, wine to the alcoholic and dice to the gambler and the way the mind of the man who wants surat is engaged in the woman, O cow! In the same way, let your mind be in your calf. (1)