अथर्ववेद (कांड 6)
मन॑सा॒ होमै॒र्हर॑सा घृ॒तेन॑ श॒र्वायास्त्र॑ उ॒त राज्ञे॑ भ॒वाय॑ । न॑म॒स्येभ्यो॒ नम॑ एभ्यः कृणोम्य॒न्यत्रा॒स्मद॒घवि॑षा नयन्तु ॥ (२)
शर्व के लिए, क्षेत्र के लिए एवं उन सब के स्वामी महादेव के लिए मैं मन से, तेज से, घृत और आज्यों से नमस्कार करता हूं. ये सभी नमस्कार के योग्य हैं. प्रसन्न हो कर ये पाप रूपी विष से पूर्ण कृत्याओं को हम से दूर ले जाएं. (२)
For sharva, for the region and for Mahadev, the swami of all of them, I greet with heart, with glory, with ghee and ajyas. All of them deserve salutations. Please be happy and take these sin-filled acts away from us. (2)