हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 6.95.2

कांड 6 → सूक्त 95 → मंत्र 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 95
हि॑र॒ण्ययी॒ नौर॑चर॒द्धिर॑ण्यबन्धना दि॒वि । तत्रा॒मृत॑स्य॒ पुष्पं॑ दे॒वाः कुष्ठ॑मवन्वत ॥ (२)
देवों ने सोने के बंधनों वाली स्वर्ग की नाभि के द्वारा कूठ वनस्पति को प्राप्त किया, जो अमृत का पुरुष है. (२)
The devas attained the kooth vegetation through the navel of heaven with gold bonds, which is the man of nectar. (2)