हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 7.102.1

कांड 7 → सूक्त 102 → मंत्र 1 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 7)

अथर्ववेद: | सूक्त: 102
यद॒द्य त्वा॑ प्रय॒ति य॒ज्ञे अ॒स्मिन्होत॑श्चिकित्व॒न्नवृ॑णीमही॒ह । ध्रु॒वम॑यो ध्रु॒वमु॒ता श॑विष्ठैप्रवि॒द्वान्य॒ज्ञमुप॑ याहि॒ सोम॑म् ॥ (१)
हे यज्ञ में देवों का आह्वान करने वाले एवं हे ज्ञानवान अग्नि! हम ने तुम्हें आज इस यज्ञ में होता के रूप में वरण किया है, इसीलिए तुम निश्चय ही यज्ञ करो तथा इस यज्ञ कर्म के दोषों को शांत करो. तुम इस यज्ञ को विशेष रूप से सोमरस युक्त जानकर आओ. (१)
O one who invokes the gods in the yajna and O agni of knowledge! We have selected you as hota in this yajna today, that is why you must perform yajna and calm the defects of this yajna karma. You come to know this yajna especially with someras. (1)