हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 7.114.2

कांड 7 → सूक्त 114 → मंत्र 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 7)

अथर्ववेद: | सूक्त: 114
घृ॒तम॑प्स॒राभ्यो॑ वह॒ त्वम॑ग्ने पां॒सून॒क्षेभ्यः॒ सिक॑ता अ॒पश्च॑ । य॑थाभा॒गं ह॒व्यदा॑तिं जुषा॒णा मद॑न्ति दे॒वा उ॒भया॑नि ह॒व्या ॥ (२)
हे अग्नि! तुम हमारी विजय के लिए अंतरिक्ष में घूमने वाली अप्सराओं को आज्य अर्थात्‌ घृत पहुंचाओ तथा हमारे विरोधी जुआरियों के लिए सूक्ष्म धूल के कण, शकर और जल पहुंचाओ, जिस से वे पराजित हों. अपनेअपने भाग के अनुसार हवि प्राप्त करते हुए देव दो प्रकार के हवि से अर्थात्‌ सोम और घृत से तृप्त होते हैं. (२)
O agni! For our victory, bring the nymphs roaming in space to the ajya i.e. disgust and bring fine dust particles, sugar and water to our opposing jurors, so that they may be defeated. According to his share, While attaining Havi, Dev is satisfied with two types of Havi i.e. Soma and Ghrit. (2)