हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 7.115.3

कांड 7 → सूक्त 115 → मंत्र 3 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 7)

अथर्ववेद: | सूक्त: 115
उप॑ त्वा दे॒वो अ॑ग्रभीच्चम॒सेन॒ बृह॒स्पतिः॑ । इन्द्र॑ गी॒र्भिर्न॒ आ वि॑श॒ यज॑मानाय सुन्व॒ते ॥ (३)
हे इंद्र! तुम्हें बृहस्पति देव ने सोमपान के द्वारा अन्यत्र जाने से रोक दिया है. हे इंद्र! तुम सोम निचोड़ने वाले यजमान को धन आदि से पुष्ट करने के लिए हम स्तोताओं की स्तुतियां सुन कर आओ. (३)
O Indra! You have been stopped by Jupiter from going elsewhere through Sompan. O Indra! You come to hear the praises of us psalmists to strengthen the host who squeezes soma with wealth etc. (3)