हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 7.120.1

कांड 7 → सूक्त 120 → मंत्र 1 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 7)

अथर्ववेद: | सूक्त: 120
प्र प॑ते॒तः पा॑पि लक्ष्मि॒ नश्ये॒तः प्रामुतः॑ पत । अ॑य॒स्मये॑ना॒ङ्केन॑ द्विष॒ते त्वा स॑जामसि ॥ (१)
हे पाप रूपिणी लक्ष्मी अर्थात्‌ दरिद्रता! तू इस प्रदेश से दूर चली जा. तू इस प्रदेश में दिखाई मत दे तथा इस प्रदेश से बहुत दूर चली जा. मैं तुझे अपने शत्रु के साथ लोहे के कांटों से बांधता हूं. (१)
Lakshmi, the sin of sin, that is, poverty! Go away from this land. Do not appear in this land and go far away from this land. I bind you with my enemy with iron thorns. (1)