अथर्ववेद (कांड 7)
ए॒ता ए॑ना॒ व्याक॑रं खि॒ले गा विष्ठि॑ता इव । रम॑न्तां॒ पुण्या॑ ल॒क्ष्मीर्याः पा॒पीस्ता अ॑नीनशम् ॥ (४)
मैं इन बताई गई एक सौ लक्ष्मियों को उसी प्रकार विभाजित कर के दो भागों में रखता हूं जिस प्रकार गोशाला में बैठी हुई गायों को ग्वाला विभाजित करता है. पुण्य लक्ष्मियां मुझ में सुख से निवास करें और पापकारिणी लक्ष्मियां मुझ से दूर चली जाएं. (४)
I divide these mentioned 100 lakshmis into two parts in the same way as the cowherd divides the cows sitting in the cowshed. May virtuous lakshmis dwell happily in me and sinful lakshmis go away from me. (4)