हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 7.120.3

कांड 7 → सूक्त 120 → मंत्र 3 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 7)

अथर्ववेद: | सूक्त: 120
एक॑शतं ल॒क्ष्म्यो॒ मर्त्य॑स्य सा॒कं त॒न्वा ज॒नुषोऽधि॑ जा॒ताः । तासां॒ पापि॑ष्ठा॒ निरि॒तः प्र हि॑ण्मः शि॒वा अ॒स्मभ्यं॑ जातवेदो॒ नि य॑च्छ ॥ (३)
एक सौ लक्ष्मियां मनुष्य के जन्म के साथ ही उत्पन्न होती हैं. उन में से अतिशय पापिष्ठ लक्ष्मी को हम इस प्रदेश से दूर भेजते हैं. हे जन्म लेने वालों के ज्ञाता अग्नि देव! उन लक्ष्मियों में जो मंगलकारिणी हैं, उन्हें हमारे साथ स्थापित करो. (३)
One hundred lakshmis arise with the birth of human beings. We send the most sinful Lakshmi away from this region. O God of agni, the knower of those who are born! Establish those Lakshmis who are Mangalkarini with us. (3)