हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 7.19.1

कांड 7 → सूक्त 19 → मंत्र 1 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 7)

अथर्ववेद: | सूक्त: 19
प्र न॑भस्व पृथिवि भि॒न्द्धी॒दं दि॒व्यं नभः॑ । उ॒द्नो दि॒व्यस्य॑ नो धात॒रीशा॑नो॒ वि ष्या॒ दृति॑म् ॥ (१)
हे पृथ्वी! बादल फसल की वृद्धि के लिए तुझ पर महती वर्षा करेंगे. उस वर्षा के कारण तू दृढ़ बन. आकाश में उत्पन्न होने वाला यह बादल पृथ्वी को विदीर्ण करे. हे धाता! आकाश में होने वाले जल का भाग हमें प्रदान करो. तुम वर्षा प्रदान करने में समर्थ मेघरूपी जलपूर्ण मशक को छोड़ो अर्थात्‌ महती वर्षा करो. (१)
O earth! Clouds will rain heavily on you for crop growth. Because of that rain, you became strong. This cloud arising in the sky will scatter the earth. O dhata! Give us part of the water in the sky. You should leave the water-filled mashak of cloud capable of providing rain, that is, do great rain. (1)