अथर्ववेद (कांड 7)
इडै॒वास्माँ अनु॑ वस्तां व्र॒तेन॒ यस्याः॑ प॒दे पु॒नते॑ देव॒यन्तः॑ । घृ॒तप॑दी॒ शक्व॑री॒ सोम॑पृ॒ष्ठोप॑ य॒ज्ञम॑स्थित वैश्वदे॒वी ॥ (१)
गहन रूपा इडा ही हमारे द्वारा किए जाते हुए यह कर्मो को फल देने वाला बनाएं. उस इडा के चरणों में देवों की कामना करने वाले यजमान अपनेआप को पवित्र करते हैं. हम जहांजहां चरण रखें वहांवहां घृत टपकाने वाली, फल देने में समर्थ एवं पीठ पर सोम लिए हुए इडा नाम की बहन हमारे यज्ञ को विस्तृत करें. (१)
Make these deeds worth bearing fruit while doing deep rupa ida. At the feet of that Ida, the hosts who wish for the gods sanctify themselves. Wherever we step, let a sister named Ida, who is able to give fruits and has soma on her back, expand our yajna. (1)