हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 7)

अथर्ववेद: | सूक्त: 30
अग्ना॑विष्णू॒ महि॒ तद्वां॑ महि॒त्वं पा॒थो घृ॒तस्य॒ गुह्य॑स्य॒ नाम॑ । दमे॑दमे स॒प्त रत्ना॒ दधा॑नौ॒ प्रति॑ वां जि॒ह्वा घृ॒तमा च॑रण्यात् ॥ (१)
हे अग्नि और विष्णु! तुम दोनों कहे जाते हुए माहात्म्यपूर्ण, महान गोपनीय, और टपकने वाले घृत को पियो. अग्नि और विष्णु प्रत्येक यज्ञशाला में रत्न धारण करते हैं. तुम दोनों की जिह्वा हवन में डाले गए घृत को सामने आ कर प्राप्त करे. (१)
O Agni and Vishnu! Drink the great, great secret, and dripping ghrit called both of you. Agni and Vishnu wear gems in every yagyashala. May the tongue of both of you come out and get the ghrit put in the havan. (1)

अथर्ववेद (कांड 7)

अथर्ववेद: | सूक्त: 30
अग्ना॑विष्णू॒ महि॒ धाम॑ प्रि॒यं वां॑ वी॒थो घृ॒तस्य॒ गुह्या॑ जुषा॒णौ । दमे॑दमे सुष्टु॒त्या वा॑वृधा॒नौ प्रति॑ वां जि॒ह्वा घृ॒तमुच्च॑रण्यात् ॥ (२)
हे अग्नि और विष्णु! तुम दोनों का तेज महान एवं सब को प्रसन्न करने वाला है. तुम दोनों, घृत के चरु, पुरोडाश आदि रूपों का भक्षण करो. परस्पर प्रसन्न होते हुए तुम दोनों सभी यजमानों के घरों में शोभन स्तुति से बढ़ते हुए अपनी जिह्वाओं से घृत का भक्षण करो. (२)
O Agni and Vishnu! The radiance of both of you is great and pleasing to all. Both of you, eat the forms of Charu, Purodash etc. of Ghrit. While being mutually pleased, both of you should grow in the houses of all the hosts with grace and eat ghee with your tongues. (2)