हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 7.30.2

कांड 7 → सूक्त 30 → मंत्र 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 7)

अथर्ववेद: | सूक्त: 30
अग्ना॑विष्णू॒ महि॒ धाम॑ प्रि॒यं वां॑ वी॒थो घृ॒तस्य॒ गुह्या॑ जुषा॒णौ । दमे॑दमे सुष्टु॒त्या वा॑वृधा॒नौ प्रति॑ वां जि॒ह्वा घृ॒तमुच्च॑रण्यात् ॥ (२)
हे अग्नि और विष्णु! तुम दोनों का तेज महान एवं सब को प्रसन्न करने वाला है. तुम दोनों, घृत के चरु, पुरोडाश आदि रूपों का भक्षण करो. परस्पर प्रसन्न होते हुए तुम दोनों सभी यजमानों के घरों में शोभन स्तुति से बढ़ते हुए अपनी जिह्वाओं से घृत का भक्षण करो. (२)
O Agni and Vishnu! The radiance of both of you is great and pleasing to all. Both of you, eat the forms of Charu, Purodash etc. of Ghrit. While being mutually pleased, both of you should grow in the houses of all the hosts with grace and eat ghee with your tongues. (2)