हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 7.42.2

कांड 7 → सूक्त 42 → मंत्र 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 7)

अथर्ववेद: | सूक्त: 42
श्ये॒नो नृ॒चक्षा॑ दि॒व्यः सु॑प॒र्णः स॒हस्र॑पाच्छ॒तयो॑निर्वयो॒धाः । स नो॒ नि य॑च्छा॒द्वसु॒ यत्परा॑भृतम॒स्माक॑मस्तु पि॒तृषु॑ स्व॒धाव॑त् ॥ (२)
मनुष्यों के सभी कर्मो को देखने वाले, दिव्य एवं शोभन गति वाले, हजार किरणों वाले, असंख्य कार्यो के कारण एवं अन्न के दाता सूर्य हमें चिरकाल तक स्थापित करें. हमारा जो धन चोरों ने चुरा लिया है, वह हमारे पितरों के निमित्त स्वधा के रूप में हो. (२)
May the sun, who sees all the deeds of human beings, divine and graceful motion, with a thousand rays, due to innumerable works and the giver of food, establish us forever. The money that our thieves have stolen should be in the form of swadha for our ancestors. (2)