हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 7.55.1

कांड 7 → सूक्त 55 → मंत्र 1 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 7)

अथर्ववेद: | सूक्त: 55
अ॑मुत्र॒भूया॒दधि॒ यद्य॒मस्य॒ बृह॑स्पतेर॒भिश॑स्ते॒रमु॑ञ्चः । प्रत्यौ॑हताम॒श्विना॑ मृ॒त्युम॒स्मद्दे॒वाना॑मग्ने भि॒षजा॒ शची॑भिः ॥ (१)
हे बृहस्पति! परलोक में भवन वाले यमराज के शाप से तुम इस ब्रह्मचारी को छुड़ाते हो. यमराज का शाप मरण का कारण है. हे अग्नि! तुम्हारी कृपा से अश्विनीकुमार अपनी क्रियाओं के द्वारा हमारे ब्रह्मचारी को मृत्यु के कारण से छुड़ाएं. (१)
O Jupiter! You rescue this brahmachari from the curse of Yamraj, who has a building in the hereafter. Yamraj's curse is the cause of death. O agni! By your grace, Ashwinikumar should free our brahmachari from the cause of death through his actions. (1)