हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 7.55.5

कांड 7 → सूक्त 55 → मंत्र 5 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 7)

अथर्ववेद: | सूक्त: 55
प्र वि॑षतं प्राणापानावन॒ड्वाहा॑विव व्र॒जम् । अ॒यं ज॑रि॒म्णः शे॑व॒धिररि॑ष्ट इ॒ह व॑र्धताम् ॥ (५)
हे प्राण और अपान वायु! जिस प्रकार गाड़ी को खींचने वाले बैल गोठ में प्रवेश करते हैं, उसी प्रकार तुम आयु चाहने वाले पुरुष के शरीर में प्रवेश करो. वह आयु चाहने वाला पुरुष वृद्धावस्था की निधि बने. वह इस लोक में मृत्यु की बाधा से रहित हो कर जीवित रहे एवं वृद्धि को प्राप्त करे. (५)
O life and your air! Just as the bulls that pull the cart enter the knot, so you enter the body of a man who wants age. That age-seeking man should become the fund of old age. He should live and attain growth in this world without the obstacle of death. (5)