अथर्ववेद (कांड 7)
सू॒नृता॑वन्तः सु॒भगा॒ इरा॑वन्तो हसामु॒दाः । अ॑तृ॒ष्या अ॑क्षु॒ध्या स्त॒ गृहा॒ मास्मद्बि॑भीतन ॥ (६)
हे घरो! तुम में प्यारी और सच्ची बातें कही जाएं, तुम शोभन भाग्य वाले बनो. सदा तुम में अन्न भरा रहे. तुम लोगों की हंसी से मुखरित रहो. हम जब बाहर से आएं तो तुम हमें पराया समझ कर भयभीत मत होना. (६)
O houses! Lovely and true things are said in you, you become lucky. May you always be full of food. Be vocal about your people's laughter. When we come from outside, do not be afraid of us as strangers. (6)