हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 7.75.2

कांड 7 → सूक्त 75 → मंत्र 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 7)

अथर्ववेद: | सूक्त: 75
श्रा॒तं ह॒विरो ष्वि॑न्द्र॒ प्र या॑हि ज॒गाम॒ सूरो॒ अध्व॑नो॒ वि मध्य॑म् । परि॑ त्वासते नि॒धिभिः॒ सखा॑यः कुल॒पा न व्रा॑जप॒त चर॑न्तम् ॥ (२)
हे इंद्र! तुम्हारे निमित्त हवि पक गया है. इसलिए तुम शीघ्र आओ. सूर्य अपने गंतव्य मार्ग के मध्य भाग में पहुंच गए हैं अर्थात्‌ दोपहर हो गया है. ऋत्विज्‌ निचोड़े हुए सोमरस के द्वारा उसी प्रकार तुम्हारी उपासना कर रहे हैं, जिस प्रकार वंश के रक्षक पुत्र गृहपति की उपासना करते हैं. (२)
O Indra! It's cooked for you. So you come soon. The Sun has reached the central part of its destination route i.e. it is noon. The Ritvijas are worshiping you through the squeezed Someras, just as the protectors of the dynasty worship the son of the housewife. (2)