हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 7.77.3

कांड 7 → सूक्त 77 → मंत्र 3 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 7)

अथर्ववेद: | सूक्त: 77
स्वाहा॑कृतः॒ शुचि॑र्दे॒वेषु॑ य॒ज्ञो यो अ॒श्विनो॑श्चम॒सो दे॑व॒पानः॑ । तमु॒ विश्वे॑ अ॒मृता॑सो जुषा॒णा ग॑न्ध॒र्वस्य॒ प्रत्या॒स्ना रि॑हन्ति ॥ (३)
दीप्त प्रवर्ग्ययाग अश्विनीकुमारों आदि देवों के निमित्त दिया गया है. अश्विनीकुमार चमस के द्वारा उस का पान करते हैं. अश्विनीकुमारों के उसी चमस को सभी अमर देव प्रसन्न होते हुए आदित्य के मुख से चाटते हैं. (३)
Deep pravargyaag has been given for the gods like Ashwinikumars etc. Ashwinikumar drinks it through Chamas. All the immortal gods lick the same chamas of Ashwinikumars from Aditya's mouth, being pleased. (3)