हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 7.77.5

कांड 7 → सूक्त 77 → मंत्र 5 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 7)

अथर्ववेद: | सूक्त: 77
त॒प्तो वां॑ घ॒र्मो न॑क्षतु॒ स्वहो॑ता॒ प्र वा॑मध्व॒र्युश्च॑रतु॒ पय॑स्वान् । मधो॑र्दु॒ग्धस्या॑श्विना त॒नाया॑ वी॒तं पा॒तं पय॑स उस्रियायाः ॥ (५)
हे अश्चिनीकुमारो! तुम दोनों होता के द्वारा भलीभांति स्तुति किए गए हो. तुम ठीक से तपाए गए एवं विशाल पात्र में स्थित आज्य अर्थात्‌ घी को प्राप्त करो. तुम्हारे लिए अध्वर्यु नामक ऋत्विज्‌ यज्ञ करे. इस के पश्चात दूध, घी आदि के द्वारा यज्ञ का विस्तार करने वाली गाय के मधुर रस से युक्त दूध को तुम दोनों पियो. (५)
O Ashchini Kumaro! You are both well praised by Hota. You should get properly heated and ghee located in a huge vessel. Perform a ritvij yagya called Adhwaryu for you. After this, both of you drink milk containing the sweet juice of the cow that expands the yajna through milk, ghee etc. (5)