अथर्ववेद (कांड 7)
सं॒व॒त्स॒रीणा॑ म॒रुतः॑ स्व॒र्का उ॒रुक्ष॑याः॒ सग॑णा॒ मानु॑षासः । ते अ॒स्मत्पाशा॒न्प्र मु॑ञ्च॒न्त्वेन॑सः सांतप॒ना म॑त्स॒रा मा॑दयि॒ष्णवः॑ ॥ (३)
प्रतिवर्ष उत्पन्न होने वाले, शोभन मंत्रों द्वारा स्तुत, विस्तृत आकाश के निवासी, अपनेअपने संघों से युक्त, वर्षा के द्वारा सब के हितकारी, शत्रुओं को संताप देने वाले, प्रसन्न होते हुए और सब को संतुष्ट करने वाले मरुत् पापों के कारण होने वाले दोष को हम से दूर रखें. (३)
Keep away from us the defects caused by the dead sins that arise every year, praised by shobhan mantras, the inhabitants of the wide sky, with their associations, beneficial to all through rain, those who afflict enemies, are happy and satisfy everyone. (3)