हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 7.87.3

कांड 7 → सूक्त 87 → मंत्र 3 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 7)

अथर्ववेद: | सूक्त: 87
इ॒हैवाग्ने॒ अधि॑ धारया र॒यिं मा त्वा॒ नि क्र॒न्पूर्व॑चित्ता निका॒रिणः॑ । क्ष॒त्रेणा॑ग्ने सु॒यम॑मस्तु॒ तुभ्य॑मुपस॒त्ता व॑र्धतां ते॒ अनि॑ष्टृतः ॥ (३)
हे अग्नि! तुम्हारी परिचर्या करने वाले हम हैं. हमें ही धन दो. हम से पहले जो लोग तुम्हारे प्रति आकर्षित थे और हमारे अपकारी थे, वे तुम्हें स्वाधीन न बनाएं. हे अग्नि! तुम्हारा स्वरूप बल के साथ स्थिर हो, तुम्हारा परिचारक यह यजमान अपनी कामनाएं प्राप्त करे तथा किसी से भी पराजित न हो. (३)
O agni! We are the ones who take care of you. Give us money. Those who were attracted to you before us and were our disobedient should not make you independent. O agni! May your nature be stable with force, may this host of your host receive his wishes and not be defeated by anyone. (3)