हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 7)

अथर्ववेद: | सूक्त: 87
अ॒भ्यर्चत सुष्टु॒तिं गव्य॑मा॒जिम॒स्मासु॑ भ॒द्रा द्रवि॑णानि धत्त । इ॒मं य॒ज्ञं न॑यत दे॒वता॑ नो घृ॒तस्य॒ धारा॒ मधु॑मत्पवन्ताम् ॥ (१)
गायों के समूह आदि की दृष्टि से जिन की शोभन स्तुति की जाती है, उन अग्नि की अर्चना करो. वह हमें भद्र धन प्रदान करें तथा हमारे इस यज्ञ में अन्य देवों को लाएं. इसलिए घृत की मधुवर्ण धाराएं देवों को प्राप्त हों. (१)
Worship the agni that is praised from the point of view of the group of cows etc. May he give us gentle wealth and bring other gods in this yagna of ours. Therefore, the gods should get the honey-colored streams of ghrit. (1)

अथर्ववेद (कांड 7)

अथर्ववेद: | सूक्त: 87
मय्यग्रे॑ अ॒ग्निं गृ॑ह्णामि स॒ह क्ष॒त्रेण॒ वर्च॑सा॒ बले॑न । मयि॑ प्र॒जां मय्यायु॑र्दधामि॒ स्वाहा॒ मय्य॒ग्निम् ॥ (२)
मैं सब से पहले अरणि मंथन से उत्पन्न अग्नि को धारण करता हूं. मैं अग्नि को क्षत्रिय संबंधी तेज, बल और सामर्थ्य के साथ हवि देता हूं. (२)
First of all, I wear the agni created by the Arani Manthan. I give agni the agni with kshatriya radiance, strength and power. (2)

अथर्ववेद (कांड 7)

अथर्ववेद: | सूक्त: 87
इ॒हैवाग्ने॒ अधि॑ धारया र॒यिं मा त्वा॒ नि क्र॒न्पूर्व॑चित्ता निका॒रिणः॑ । क्ष॒त्रेणा॑ग्ने सु॒यम॑मस्तु॒ तुभ्य॑मुपस॒त्ता व॑र्धतां ते॒ अनि॑ष्टृतः ॥ (३)
हे अग्नि! तुम्हारी परिचर्या करने वाले हम हैं. हमें ही धन दो. हम से पहले जो लोग तुम्हारे प्रति आकर्षित थे और हमारे अपकारी थे, वे तुम्हें स्वाधीन न बनाएं. हे अग्नि! तुम्हारा स्वरूप बल के साथ स्थिर हो, तुम्हारा परिचारक यह यजमान अपनी कामनाएं प्राप्त करे तथा किसी से भी पराजित न हो. (३)
O agni! We are the ones who take care of you. Give us money. Those who were attracted to you before us and were our disobedient should not make you independent. O agni! May your nature be stable with force, may this host of your host receive his wishes and not be defeated by anyone. (3)

अथर्ववेद (कांड 7)

अथर्ववेद: | सूक्त: 87
अन्व॒ग्निरु॒षसा॒मग्र॑मख्य॒दन्वहा॑नि प्रथ॒मो जा॒तवे॑दाः । अनु॒ सूर्य॑ उ॒षसो॒ अनु॑ र॒श्मीननु॒ द्यावा॑पृथि॒वी आ वि॑वेश ॥ (४)
अग्नि देव प्रातःकाल के पूर्व से ही प्रकाशित होते हैं. महान जातवेद अग्नि इस के पश्चात दिनभर प्रकाशित रहते हैं. ये सूर्यात्मक अग्नि प्रातःकाल के पश्चात व्यापक किरणों के द्वारा प्रकाशित होते हैं. अग्नि का यह प्रकाश धरती और आकाश दोनों में प्रवेश कर के प्रकाशित करता है. (४)
Agni Dev is illuminated from before dawn. The great Jataveda agni is illuminated throughout the day after this. These solar agnis are illuminated by wide rays after dawn. This light of agni enters both the earth and the sky and illuminates it. (4)

अथर्ववेद (कांड 7)

अथर्ववेद: | सूक्त: 87
प्रत्य॒ग्निरु॒षसा॒मग्र॑मख्य॒त्प्रति॒ अहा॑नि प्रथ॒मो जा॒तवे॑दाः । प्रति॒ सूर्य॑स्य पुरु॒धा च॑ र॒श्मीन्प्रति॒ द्यावा॑पृथि॒वी आ त॑तान ॥ (५)
अग्नि देव प्रातःकाल से पूर्व ही प्रकाशित होते हैं. महान जातवेद अग्नि इस के पश्चात दिन भर प्रकाशित रहते हैं. अग्नि अनेक रूप से प्रवृत्त होने के कारण सूर्य की किरणों के रूप में स्वयं ही प्रकाशित होते हैं. इस प्रकार अग्नि देव धरती और आकाश में सभी जगह प्रकाशित होते हैं. (५)
Agni Dev is illuminated before dawn. The great Jataveda agni remains illuminated throughout the day after this. Agni is manifested in many ways, due to which they are illuminated in the form of rays of the sun. In this way, the agni god is illuminated everywhere in the earth and sky. (5)

अथर्ववेद (कांड 7)

अथर्ववेद: | सूक्त: 87
घृ॒तं ते॑ अग्ने दि॒व्ये स॒धस्थे॑ घृ॒तेन॒ त्वां मनु॑र॒द्या समि॑न्धे । घृ॒तं ते॑ दे॒वीर्न॒प्त्य आ व॑हन्तु घृ॒तं तुभ्यं॑ दुह्रतां॒ गावो॑ अग्ने ॥ (६)
हे अग्नि! तुम से संबंधित हवि देवों के साथ उन के निवास स्थान अर्थात्‌ स्वर्ग में है. इस समय हम तुम्हें घृत के द्वारा भलीभांति तृप्त करते हैं. हे अग्नि! तुम्हें दिव्य जल प्राप्त हो तथा गाएं तुम्हारे लिए घृत प्रदान करें. (६)
O agni! Havi related to you is in their abode i.e. heaven with the gods. At this time, we satisfy you well through disgust. O agni! May you receive divine water and sing for you. (6)