हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 7.87.5

कांड 7 → सूक्त 87 → मंत्र 5 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 7)

अथर्ववेद: | सूक्त: 87
प्रत्य॒ग्निरु॒षसा॒मग्र॑मख्य॒त्प्रति॒ अहा॑नि प्रथ॒मो जा॒तवे॑दाः । प्रति॒ सूर्य॑स्य पुरु॒धा च॑ र॒श्मीन्प्रति॒ द्यावा॑पृथि॒वी आ त॑तान ॥ (५)
अग्नि देव प्रातःकाल से पूर्व ही प्रकाशित होते हैं. महान जातवेद अग्नि इस के पश्चात दिन भर प्रकाशित रहते हैं. अग्नि अनेक रूप से प्रवृत्त होने के कारण सूर्य की किरणों के रूप में स्वयं ही प्रकाशित होते हैं. इस प्रकार अग्नि देव धरती और आकाश में सभी जगह प्रकाशित होते हैं. (५)
Agni Dev is illuminated before dawn. The great Jataveda agni remains illuminated throughout the day after this. Agni is manifested in many ways, due to which they are illuminated in the form of rays of the sun. In this way, the agni god is illuminated everywhere in the earth and sky. (5)