अथर्ववेद (कांड 7)
त्यमू॒ षु वा॒जिनं॑ दे॒वजू॑तं॒ सहो॑वानं तरु॒तारं॒ रथा॑नाम् । अरि॑ष्टनेमिं पृतना॒जिमा॒शुं स्व॒स्तये॒ तार्क्ष्य॑मि॒हा हु॑वेम ॥ (१)
हम यज्ञकर्म की पूर्ति के निमित्त गरुड़ का आह्वान करते हैं. वह बलशाली, देवों के द्वारा सोम लाने हेतु प्रेरित तथा सब को पराजित करने वाले हैं. उन के रथ पर कोई आक्रमण नहीं कर सकता. वह संग्राम में शत्रुओं को नष्ट करने वाले हैं. गरुड़ शत्रु सेनाओं के विजेता एवं शीघ्रगामी है. (१)
We invoke Garuda for the fulfillment of yajna karma. He is powerful, inspired by the gods to bring soma and defeats everyone. No one can attack his chariot. He is going to destroy enemies in the struggle. Garuda is the conqueror and quick-moving of the enemy armies. (1)