हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 8.2.10

कांड 8 → सूक्त 2 → मंत्र 10 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 8)

अथर्ववेद: | सूक्त: 2
यत्ते॑ नि॒यानं॑ रज॒सं मृत्यो॑ अनवध॒र्ष्यम् । प॒थ इ॒मं तस्मा॒द्रक्ष॑न्तो॒ ब्रह्मा॑स्मै॒ वर्म॑ कृण्मसि ॥ (१०)
हे मृत्यु! तेरे रजोमय मार्ग को कोई धर्षित नहीं कर सकता. उस मार्ग से मैं इस मृत्यु के समीप पहुंचे हुए पुरुष के लिए मनन रूपी कवच पहनाता हूं. (१०)
O death! No one can disturb your rajomoya path. Through that route, I wear the armor of meditation for the man who has come near this death. (10)