अथर्ववेद (कांड 8)
याव॑तीः॒ किय॑तीश्चे॒माः पृ॑थि॒व्यामध्योष॑धीः । ता मा॑ सहस्रप॒र्ण्यो मृ॒त्योर्मु॑ञ्च॒न्त्वंह॑सः ॥ (१३)
पृथ्वी पर जितनी भी हजार पत्तों वाली जड़ीबूटियां हैं, वे मुझे मृत्यु एवं पाप से बचाएं. (१३)
May all the thousand leaf herbs on earth save me from death and sin. (13)