अथर्ववेद (कांड 8)
तस्या॒मृत॑स्ये॒मं बलं॒ पुरु॑षं पाययामसि । अथो॑ कृणोमि भेष॒जं यथास॑च्छ॒तहा॑यनः ॥ (२२)
जड़ीबूटियों के अमृत रूपी बल को मैं रोगी पुरुष को पिलाता हूं. मैं इस की चिकित्सा इस प्रकार करता हूं कि यह रोगी पुरुष सौ वर्ष की अवस्था प्राप्त करे. (२२)
I feed the nectar-like force of herbs to the patient man. I treat it in such a way that this patient man attains the age of 100 years. (22)