हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 9)

अथर्ववेद: | सूक्त: 11
यत्क्ष॒त्तारं॒ ह्वय॒त्या श्रा॑वयत्ये॒व तत् ॥ (१)
जो क्षत्ता अर्थात्‌ इच्छित कार्य करने वाले का आह्वान करता है, वह श्रुति को ही सुनाता है. (१)
The one who invokes the person who does the desired work, he narrates it to Shruti. (1)

अथर्ववेद (कांड 9)

अथर्ववेद: | सूक्त: 11
यत्प्र॑तिशृ॒णोति॑ प्र॒त्याश्रा॑वयत्ये॒व तत् ॥ (२)
जो प्रतिज्ञा करता है, वही श्रुति को सुनाने का आग्रह करता है. (२)
The one who makes the pledge urges Shruti to recite. (2)

अथर्ववेद (कांड 9)

अथर्ववेद: | सूक्त: 11
यत्प॑रिवे॒ष्टारः॒ पात्र॑हस्ताः॒ पूर्वे॒ चाप॑रे च प्र॒पद्य॑न्ते चम॒साध्व॑र्यव ए॒व ते ॥ (३)
हाथों में पात्र लिए जो परोसने वाले आगेपीछे चलते हैं, वे ही यज्ञ के चमस और अध्वर्यु हैं. (३)
The servings who walk behind with utensils in their hands are the chamas and adhwaryu of the yajna. (3)

अथर्ववेद (कांड 9)

अथर्ववेद: | सूक्त: 11
तेषां॒ न कश्च॒नाहो॑ता ॥ (४)
उन अतिथियों में कोई भी ऐसा नहीं है जो होता अर्थात्‌ हवन करने वाला न हो. (४)
There is no one among those guests who is not going to perform havan. (4)

अथर्ववेद (कांड 9)

अथर्ववेद: | सूक्त: 11
यद्वा अति॑थिपति॒रति॑थीन्परि॒विष्य॑ गृ॒हानु॑पो॒दैत्य॑व॒भृथ॑मे॒व तदु॒पावै॑ति ॥ (५)
जो अतिथि सत्कार कर्ता अतिथियों को भोजन परोस कर घरों में आता है, वह यज्ञ के पश्चात होने वाले अवभृथ स्नान का फल प्राप्त करता है. (५)
The guest who comes to the houses after serving food to the guests, he gets the fruits of the abbhrith bath after the yajna. (5)

अथर्ववेद (कांड 9)

अथर्ववेद: | सूक्त: 11
यत्स॑भा॒गय॑ति॒ दक्षि॑णाः सभागयति॒ यद॑नु॒तिष्ठ॑त उ॒दव॑स्यत्ये॒व तत् ॥ (६)
जो यजमान भोज्य पदार्थो को अलगअलग करता हुआ तथा दक्षिणा देता हुआ अनुष्ठान करता है, वह उदवास करता है. (६)
The host who performs the ritual separating the food items and giving dakshina, he exudes. (6)

अथर्ववेद (कांड 9)

अथर्ववेद: | सूक्त: 11
स उप॑हूतः पृथि॒व्यां भ॑क्षय॒त्युप॑हूत॒स्तस्मि॒न्यत्पृ॑थि॒व्यां वि॒श्वरू॑पम् ॥ (७)
वह बुला कर पृथ्वी के समस्त प्राणियों को भोजन कराता है, उस अतिथि सत्कार में मानो विश्वरूप ही बुलाए जाते हैं. (७)
He calls and feeds all the creatures of the earth, in that hospitality, it is as if the world forms are called. (7)

अथर्ववेद (कांड 9)

अथर्ववेद: | सूक्त: 11
स उप॑हूतो॒ऽन्तरि॑क्षे भक्षय॒त्युप॑हूत॒स्तस्मि॒न्यद॒न्तरि॑क्षे वि॒श्वरू॑पम् ॥ (८)
वह बुलाने पर स्वर्ग में भोजन करता है. अंतरिक्ष में जो विश्वरूप है, वह उस के यहां बुलाया जाता है. (८)
He eats in heaven when called. The world form in space is called to him. (8)
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