हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 9.13.2

कांड 9 → सूक्त 13 → मंत्र 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 9)

अथर्ववेद: | सूक्त: 13
कर्णा॑भ्यां ते॒ कङ्कू॑षेभ्यः कर्णशू॒लं वि॒सल्प॑कम् । सर्वं॑ शीर्ष॒र्ण्यं ते॒ रोगं॑ ब॒हिर्निर्म॑न्त्रयामहे ॥ (२)
मैं तेरे कानों से तथा कानों के गङ्ढों से कर्णशूल अर्थात्‌ कानों के दर्द को तथा विसल्पक (विशेष कष्ट देने वाले)को दूर करता हूं. इस प्रकार मैं तेरे शीश संबंधी सभी रोगों को दूर करता हूं. (२)
I remove from your ears and from the necks of the ears, that is, the pain of the ears and the diffuser (the one who causes special pain). In this way, I remove all diseases related to your head. (2)