हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 9.14.15

कांड 9 → सूक्त 14 → मंत्र 15 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 9)

अथर्ववेद: | सूक्त: 14
स्त्रियः॑ स॒तीस्ताँ उ॑ मे पुं॒सः आ॑हुः॒ पश्य॑दक्ष॒ण्वान्न वि चे॑तद॒न्धः । क॒विर्यः पु॒त्रः स ई॒मा चि॑केत॒ यस्ता वि॑जा॒नात्स पि॒तुष्पि॒तास॑त् ॥ (१५)
सभी स्त्रियां उसी को ज्ञानी पुरुष कहती हैं, जो उन्हें क्षयहीन प्रतीत होता है. इस के विपरीत दशा वाले पुरुष को वे ज्ञान शून्य समझती हैं. जो विद्धान्‌ पुत्र इस बात को जानता है, वह पालकों का भी पालन करता है. (१५)
All women call him a wise man, who seems to them to be decayless. They consider a man with the opposite condition to be zero in knowledge. The learned son who knows this also follows the guardians. (15)