हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 9.15.13

कांड 9 → सूक्त 15 → मंत्र 13 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 9)

अथर्ववेद: | सूक्त: 15
पृ॒च्छामि॑ त्वा॒ पर॒मन्तं॑ पृथि॒व्याः पृ॒च्छामि॒ वृष्णो॒ अश्व॑स्य॒ रेतः॑ । पृ॒च्छामि॒ विश्व॑स्य॒ भुव॑नस्य॒ नाभिं॑ पृ॒च्छामि॑ वा॒चः प॑र॒मं व्योम ॥ (१३)
मैं तुम से पृथ्वी के अंतिम स्थान के विषय में पूछता हूं. मैं इच्छा पूर्ण करने वाले एवं व्यापक परमेश्वर के विषय में पूछता हूं. मैं संपूर्ण भुवन की नाभि अर्थात्‌ केंद्र के विषय में पूछता हूं. मैं वाकू के परमव्योम में व्याप्त होने के विषय में भी पूछता हूं. (१३)
I ask you about the last place of the earth. I ask about the will-fulfilling and comprehensive God. I ask about the navel of the whole bhuvan, that is, the center. I also ask about waku being prevalent in the supreme world. (13)