हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 9.15.12

कांड 9 → सूक्त 15 → मंत्र 12 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 9)

अथर्ववेद: | सूक्त: 15
द्यौर्नः॑ पि॒ता ज॑नि॒ता नाभि॒रत्र॒ बन्धु॑र्नो मा॒ता पृ॑थि॒वी म॒हीयम् । उ॑त्ता॒नयो॑श्च॒म्वो॒र्योनि॑र॒न्तरत्रा॑ पि॒ता दु॑हि॒तुर्गर्भ॒माधा॑त् ॥ (१२)
सृष्टि की रचना करने वाला एवं वीर्योत्पादक द्यौ भी हमारा पिता है. नाभि अर्थात्‌ धरती और आकाश का मध्य भाग मेरा भाई है. महीयसी पृथ्वी मेरी माता है. यह वर्षा के जल को ओषधि के रूप में धारण करती है. आकाश और पृथ्वी सूत्र रूप में वायु को धारण करते हैं. पिता रूपी द्यौ पृथ्वी में वर्षा रूपी गर्भ धारण करता है. (१२)
The creator of the universe and the semen-producing dau is also our father. The navel, that is, the middle part of the earth and the sky, is my brother. Mahiasi Prithvi is my mother. It holds rainwater as a medicine. The sky and the earth hold the air in the form of formulas. The father's mother conceives in the form of rain in the earth. (12)