हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 9.15.17

कांड 9 → सूक्त 15 → मंत्र 17 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 9)

अथर्ववेद: | सूक्त: 15
स॒प्तार्ध॑ग॒र्भा भुव॑नस्य॒ रेतो॒ विष्णो॑स्तिष्ठन्ति प्र॒दिशा॒ विध॑र्मणि । ते धी॒तिभि॒र्मन॑सा॒ ते वि॑प॒श्चितः॑ परि॒भुवः॒ परि॑ भवन्ति वि॒श्वतः॑ ॥ (१७)
व्यापक ब्रह्म की सात किरणें वीर्य के रूप में वर्तमान रहती हैं. वे किरणें कर्म की उत्पत्ति के रूप से समस्त जगत्‌ में विस्तृत होती हैं. (१७)
The seven rays of broad Brahman remain present in the form of semen. Those rays are spread throughout the world as the origin of karma. (17)