अथर्ववेद (कांड 9)
ऋ॒चः प॒दं मात्र॑या क॒ल्पय॑न्तोऽर्ध॒र्चेन॑ चाक्लृपु॒र्विश्व॒मेज॑त् । त्रि॒पाद्ब्रह्म॑ पुरु॒रूपं॒ वि त॑ष्ठे॒ तेन॑ जीवन्ति प्र॒दिश॒श्चत॑स्रः ॥ (१९)
ओंकार के पद की कल्पना करते हुए जनों ने उसी अर्थ में इस चैतन्य और गतिशील विश्व की कल्पना की. निश्चल ब्रह्म तीन मात्राओं से निज रूप में स्थित रहता है और इस की एक मात्रा से चारों दिशाएं अर्थात् चारों दिशाओं में वर्तमान प्राणी जीवित रहते हैं. (१९)
While imagining the verse of Omkar, the people imagined this chaitanya and dynamic world in the same sense. (19)